क्या पता था कि किस्सा बदल जाएगा,
घर के लोगों से रिश्ता बदल जाएगा।
हाथ से मुँह के अंदर पहुँचने के बाद,
एक पल में बताशा बदल जाएगा।
दो दशक बाद अपने ही घर लौट कर,
कुछ न कुछ घर का नक्शा बदल जाएगा।
वो बदलता है अपना नज़रिया अगर,
सोचने का तरीका बदल जाएगा।
चश्मदीदों की निर्भय गवाही के बाद।
खुद-ब-खुद ये मुकदमा बदल जाएगा।
लौट आया जो पिंजरे में थक-हार कर,
अब वो बागी परिंदा बदल जाएगा।
घर के अंदर दिया बालते साथ ही,
घुप अंधेरे का चेहरा बदल जाएगा।
Monday, July 26, 2010
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